Thursday, 5 April 2012

हिंसा का प्रतिकार अहिंसा से -भगवान महावीर

विचार :-
महावीर जन्म कल्याणक की आपको हार्दिक शुभकामनाये
भगवान महावीर का सिदान्तो में से एक महत्वपूर्ण सिद्धांत जो मुझे लगता है वो ये है की अग्नि का शमन अग्नि से नहीं होता, इसके लिए जल की आवश्यकता होती है ! इसी प्रकार हिंसा का प्रतिकार कभी भी हिंसा से नहीं हो सकता है इसके लिए अहिंसा की आवश्यकता होती है !
जब तक साधन पवित्र नहीं होता साध्य में पवित्रता नहीं आ सकती ! हिंसा सूक्ष्म रूप में समाहित होती है ! उसे निकालने के लिए सभी प्रकार के विकारों, वासनाओ का त्याग आवश्यक है !
श्रेणिक जैन
जय जिनेन्द्र देव की
उत्तम क्षमा पाप क्षय पुण्य जमा

Wednesday, 4 April 2012

पहली अप्रैल का क्या मतलब ?

विचार :-
अभी २-३ दिन पहले 01 अप्रैल थी .....!!! इस दिन को बहुत से लोगों ने मूर्ख दिवस की उपमा दी हुयी हैं और इस बहाने लोग खूब झूंट बोलते हैं जैसे की उन्हें इस दिन झूंट बोलने का license मिल गया हो........

दोस्तों मैंने एक बार कही पढ़ा था ......
""एक दोस्त ने अपने दूसरे शहर में रहने वाले दोस्त से अप्रैल फूल बनाने के लिए ऐसे ही कह दिया की उसके पापा का एक्सिडेंट हो गया हैं, ये खबर सुन कर उसका दोस्त आनन् फानन में बिना पल गवाए अपनी गाड़ी से अपने पापा को देखने निकल गया और जल्दी पहुचने की जद्दोजहद में उसकी गाड़ी का एक्सिडेंट हो गया और वो ख़तम हो गया, ये खबर सुनकर उस लड़के के पापा को heart attach आ गया वो भी ख़तम हो गए ""

तो दोस्तों ये मूर्ख दिवस क्या बोलना सिखाता हैं ???? अब ये आपका निर्णय होगा....!!!!!

श्रेणिक जैन
उत्तम क्षमा पाप क्षय पुण्य जमा 

Tuesday, 3 April 2012

क्या दान सिर्फ दिखावा ????

विचार :-
कितने दुःख की बात है ना आज दान लोग सिर्फ झूठा दिखावा करने के लिए करते है आज अगर लोग दान देते है तो सिर्फ इसीलिए की उनका नाम हो आप मंदिर में देखते होगे की इतनी मुर्तिया मंदिर में नहीं मिलती जितने नाम मिलते है !
क्या हो गया आज लोगो को की वो सिर्फ दान इसीलिए देते है की बस उसका नाम लिखा जाये ऐसा क्यों ???
क्या आज देश में दान की वो इच्छा जो किसी के भले के लिए किये गए कार्य को कहते थे आज वही दान सिर्फ पैसे दे देने का महत्व और वो भी सिर्फ अपना नाम दस पन्द्रह जगह लिखवाने के लिए किये कार्य की प्रवर्ती में बदल गयी है !
शर्म कीजिये और अपने दान को सद् मार्ग दीजिए............
जय जिनेन्द्र देव की
श्रेणिक जैन 

पानी छानना एवं उसकी मर्यादा

विचार :-
आज का विचार उसके बारे में है जिसमे आप ये समझ सकेगे की अगर हम पानी छानते है तो उसकी मर्यादा क्या होती है और वास्तव में पानी छानने की विधि क्या है........
पानी छानने से तात्पर्य है कि एक मोटा कपडा जिसमे से सुर्य की रोशनी नज़र नही आती हो ऐसे कपडे को दोहरा कर छानना चाहिये तथा जावणी जहा से पानी लाया गया है वही पर  वापस डालनी चाहिये. जावणी से तात्पर्य होता है की उस कपडे को उल्टा करके कुछ पानी( छना हुवा ) वापस डाल कर पानी के जीवो को दुबारा पानी में ही पंहुचा कर हिंसा के दोष से भी बचना !
इस छने पानी की मर्यादा 48 मिनिट है. 48 मिनिट बाद इसे दुबारा छानना होगा.
यदि छने पानी को उबाल कर लोंग डाल ले तो इसकी मर्यादा 24 घण्टे की होती है. तथा इसके साथ साथ लोग समझते है की बिसलेरी,फिल्टर,मिट्टी के मटके का पानी भी छना हुवा है तो वो गलत है इनका पानी अनछना होता है !
श्रेणिक जैन
उत्तम क्षमा पाप क्षय पुण्य जमा 

त्यागी पर टिप्पणी

विचार :-
मैंने बहुत से लोगो को कहते हुवे सुना की वो पता नहीं क्यों साधू, महात्मा, संत पुरुषों आदि पर टिप्पणी करते रहते है कुछ कहते है "साधू को सिर्फ एक वक्त खाना खाना चाहिए या साधू को मोबाइल नहीं रखना चाहिए ये कुछ कहते है साधू आज कल पार्टी आदि में जाने लगे है " मेरे उन लोगो से कुछ प्रशन है :-
१. क्या साधू आपके घर आके आपसे अनुरोध कर रहे थे की आप हमारे पास आइये ! आप जब भी जाते है अपनी श्रद्धा से जाते है तो फिर उनके बारे में इतनी शिकायत क्यों ?
२. सबसे आपके बारे में कहते है की आप मोबाइल रखते है या नहीं, या आपसे कहते है की आप मत रखा कीजिये !
या
३. मै आपसे पूछना चाहता हू वो आपसे आके कह रहे है की आप अपने यहाँ मुझे आहार करवाइए या कह रहे है की मै २ टाइम खाता हू और दोनों टाइम आपके यहाँ ही खाना खाउगा !
एक बात हमेसा समझ लीजिए आप उनकी बुराई करके उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते है बल्कि अपना बहुत कुछ बिगाड़ रहे है अपने कर्मो का संचय ( कर्मो को बढ़ाना ) करके !

श्रेणिक जैन
उत्तम क्षमा पाप क्षय पुण्य जमा 

Sunday, 1 April 2012

दर्द से टूट रहा हर एक दिल

विचार :- जो बहुत कुछ सिखने और सोचने पर मजबूर करता है (ये कविता मेरी नहीं पर बहुत सुन्दर है)


हर दिल टुटा नज़र आता है

हर भूखे को चाँद भी रोटी नज़र आता है
जिधर देखो , हर दिल टुटा नज़र आता है

कुछ इस कदर हिल गया है,विश्वास का पेड
अब तो हर दोस्त भी ,दुश्मन नज़र आता है

बहुत बढ़ गया है प्रदूषण , हमारे पर्याबरण में
अब तो हर पेड़ भी , सुखा नज़र आता है

चीनी खाते है हमसब, मगर मुह में मिठास नहीं है
हर आवाज़ में अब क्यों , कडवाहट नज़र आता है !

श्रेणिक जैन
उत्तम क्षमा पाप क्षय पुण्य जमा

पैर की खरोंच और रिक्शा वाले भाई

विचार :-
एक विचार जो हमें हमेसा रुला देता है और बहुत कुछ सिखा भी जाता है जिसे एक कविता के माध्यम से लिख रहा हू..........

हम बैठ के ऑफिस में 
अपने बॉस से छुट्टी की गुजारिश करने लगे 
कुछ परेसान से थे हम 
कुछ दर्द में भी थे हम 
क्योकि पैर में आई थी एक हलकी से खरोंच

हमारी अर्जी को देख के बॉस ने 
दे दी थी हमें छुट्टी और कहा था घर जाने को 

घर आते ही पिता ने डाटा की इतनी सी खरोंच के लिए छुट्टी 
क्यों ली और वो भी २ दिन की 
और डाटते हुवे कहा की कल ही ऑफिस जाना

हमने रात भर बहुत सोचा और मन को मार कर
अनमने मन से ही और ना जाने क्यों पिता जी को बुरा भला कह कर
ऑफिस जाने को हुवे तैयार

जैसे ही हम रिक्शा स्टैंड पर पहुचे 
क्योकि हम थोडा भी चलना नहीं चाहते थे 
और जैसे ही रिक्शे वाले को देखा तो उसके पुरे पैर में पट्टिया देखी 
तो अचानक ही पूछ लिया
"भाई पैर में तो चोट है रिक्शा चलाओगे कैसे "
रिक्शे वाले की बात सुनकर हमें अपने आप पर ही शर्म आने लगी
उसने कहा 
"बाबूजी रिक्शा पैर से नहीं पेट से चलती है "