Wednesday, 7 March 2012

होली

विचार :-
आ गयी है होली देखिये चारो और छा रही है खुशिया
तो क्यों ना सब गिले शिकवे मिटा कर एक दूसरे से गले मिल ले
क्यों ना इस बार आओ रंग बिरंगे इन रंगों की तरह अपने से जुड़े हर इंसान की झोली को रंग बिरंगी खुशियों से भर दे..............

Tuesday, 6 March 2012

लायक या नालायक फैसला आपका

विचार :-
माँ- बाप होने के नाते अपने बच्चों को खूब पढाना-लिखाना और पढ़ा-लिखाकर खूब लायक बनाना, मगर इतना भी लायक मत बना देना कि कल वो तुम्हे ही नालायक समझने लगे !
अगर तुमने आज ये भूल की तो कल बुढ़ापे में तुम्हें बहुत रोना-पछताना पड़ेगा ! यह बात मैं इसीलिए कह रहा हूँ, क्योकि कुछ लोग यह भूल जिंदगी में कर चुके है और वे आज रो रहे है लेकिन इतना ध्यान रखना की अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत !
श्रेणिक जैन
उत्तम क्षमा पाप क्षय पुण्य जमा.........

नीचे बैठना और गिरना

आज एक बहुत सुन्दर कहानी पढ़ी जिसमे एक बहुत सुन्दर पैरा पढ़ा वो आपके सामने रख रहा हू !
कि किसी ने शंका समाधान के वक्त एक संत से युही पूछ लिया कि आप जमीन पर बैठना इतना पसंद क्यों करते है जबकि सब आपको कुर्सी पूछते रहते है ?
तो संत ने बड़ी सरल भाव से उत्तर दिया की नीचे बैठने वाला मनुष्य कभी गिरता नहीं....
उनका इतना कहना था की सदन में तालियाँ गूंज उठी !

जय जिनेन्द्र का अर्थ


जय जिनेन्द्र का अर्थ है , 'जय ' यानी जयवंत रहो , जयवंत हो जाओ ऐसा भी होता है !
इसके कई अर्थ हो सकते है जैसे :-
१. जयवंत हो जाओ ,
२. जिनेन्द्र भगवन के सामान विजयी बनो
३. जिनेन्द्र भगवान की जय हो
४. विजय बनो , जीतने के लिए संसारी प्राणी के पास बहोत कुछ है ,जीतने के जो विषय है वो अन्तरंग में है , विजय किसपर पाना , एक विकारी भाव और दूसरा विकार भाव उत्पन्न करनेवाले पर विजय पाना है !
जो संसारी प्राणी दुःख से पीड़ित है उसे जय जिनेन्द्र बोलते है , जिनेन्द्र भगवन ने अपने आत्मा के विकारी भावों को जीतकर संसारी वास्तु को जीत लिया है , वैसे ही दुखी व्यक्ति भी दुःख को जीतकर सुखी हो..... जय-जिनेन्द्र – जैनों में परस्पर विनय और प्रेमभाव प्रकट करने के लिये जय-जिनेन्द्र शब्द बोला जाता है । पहली बात तो जय जिनेन्द्र बोलने से जैन होने की पहचान होती है और साथ में भगवान् का नाम भी हम ले लेते है अगर कोई हमारे मुख से जय जिनेन्द्र सुने तो हमारे संस्कार अच्छे दीखते है ......जय जिनेन्द्र

मोक्षमार्ग का रास्ता मुक्तक (7)

मुक्तक मोक्षमार्ग का रास्ता (7)

शांति चाहते हो यदि तो, ह्रदय से ह्रदय मिलाकर देखो,
चैन  के  लिए  सम्यकज्ञान  का  दीप  जलाकर  देखो !
चाहते  हो  यदि  तुम  मोक्षमार्ग  का  रास्ता  मेरे  बंधू ,
तो  जीवन  में  सद्  धर्म  का  फूल  खिलाकर  देखो  !!

Sunday, 4 March 2012

तीर्थंकर

विचार :-
जैन धर्म के अनुसार जो संसार सागर से स्वयं तैर कर पार होकर तथा अन्य जीवो को तैरने के साधनों का उपदेश देते है और प्रचार करते है उन्हें तीर्थंकर कहते है ये काल के अनुसार 24 होते है
श्रेणिक जैन
उत्तम क्षमा पाप क्षय पुण्य जमा  

Saturday, 3 March 2012

कन्या हत्या और इंसानी कुत्ते कविता (४)

कोर्ट में अलग ही मुकद्दमा आया
सिपाही एक कुत्ते को बांध कर लाया

सिपाही ने जब कटघरे में उस कुत्ते को खोला
कुत्ता रहा चुपचाप, मुह से कुछ भी ना बोला

नुकिले दाँदां में कुछ खून-सा नज़र आ रहा था 
चुपचाप था कुत्ता, किसी से नजर नही मिला रहा था 

हुआ खड़ा एक वकील
देने लगा दलील

बोला, ये ज़ालिम पेचीदा है
जज सॉब ये कुत्ता है

इसने जो साख कमाई है
देख कै इन्सानियत घबराई है

क्रुर है, निर्दयी है, इसने बहुत तबाही मचाई है
दो दिन पहले जन्मी एक कन्या, अपने दांतों से खाई है

अब कतई ना देखो बाट
उतारो इसको मौत के घाट
जज का गया खून खोल
तू क्यूँ खाई कन्या अबे बोल

हुक्म आप इसे जिंदा रहने मत दो 
कुत्ते का वकील बोला, इसे भी कुछ कहने तो दो

तब कुत्ते ने अपना मुँह खोला 
बड़े ही सहज सुर मैं वो बोला 

हाँ, मैंने वो कन्या खाई है
अपनी कुत्तानियत निभाई है

कुत्ते का धर्म है नही दया दिखाना
माँस चाहे किसी-का हो, बस खा जाना

पर मैं दया-धर्म से दूर नही
खाया तो है, पर मेरा कसूर नही

मुझे पता है, जब वो बच्ची गई फैकाई 
और कोई नही, उसकी माँ ही उसे फेंकने आई

जब मैं उस कन्या के गया पास
उसकी आंखो मैं देखा भोला विश्वास

जब वो मेरी जीभ देख कै मुस्काई थी 
कुत्ता हूँ, पर उसने मेरे अन्दर इन्सानियत जगाई थी 

मैंने सूंघ- कर बड़ी मुश्किल से वो घर खोजा था
जहाँ थी माँ उसकी, और बालक भी सोया था 

मैंने कू-कू करकै वो माँ जगाई
पूछा तुने वो, कन्या क्यों फैकाई

चल, मेरे पीछे, उसे लै कै आ
भूखी है वो, उसे अपना दूध पिला
माँ सुनते ही रोने लगी
अपने दुखडे धोने लगी

बोली, नही लाऊँगी अपने कलेजे के टुकड़े को
कैसे कर खोल बताऊँ अपने मन के दुखड़ै को

मेरे घर पहले ही चार छोरीयाँ है
दो को बुखार है, और दो चटाई पै सो रई है

मेरी सास मारै है ताना की मार
मुझे पीटने आता मेरा भरतार

बोला, फिर छोरी ले आई
कैसे होगी इनकी ब्याह सगाई

वंश की तुने काट दी बेल
जा खत्म कर दे इसका खेल

माँ हूँ, पर थी मेरी लाचारी
तब फैंक आई, छोरी प्यारी

कुत्ते का गला भर गया
पर ब्यान वो पुरा कर गया

बोला, मैं फिर वापस आ गया
दिमाग मैं मेरे धुंआ सा छा गया 
वो कन्या अंगूठा चूस रही थी
हँसी ऐसे जैसे मेरे इन्तजार में जाग रही थी

कलेजे पै धर लिया मैंने पात्थर
थर-थर काँपने लगा मेरा ज़ॉथर 

बोला, ऐ बावली, जी कै, क्या करेगी 
दूध नही, जहर है, पी कै, क्या करेगी 

हम कुत्तो को करते है बदनाम
हम से ज्यादा घिनौने करते है काम

कब ज़िन्दी अरक दे पेट मैं मरवाते है
और अपने आप को इन्सान बताते है

मेरे मन मैं भय कर गई उसकी मुस्कान
मैंने आज इतना तो लिया जान 

जो समाज इस-से नफरत करता है
कन्या हत्या-सी गन्दी हरकत करता है

वहाँ-से तो इसका जाना अच्छा 
इसका तो मर जाना अच्छा 

तुम लटकाओ मुझे फांसी, चाहे मारो जूत्ते
पर ढूढ कै लाओ पहले वो इन्सानी कुत्ते
पर ढूढ कै लाओ पहले वो इन्सानी कुत्तेBottom of Form